सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
(२१ फरवरी १८९७ - १५ अक्तूबर १९६१)
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' जी की कविता सागर पर प्रेषित हुई रचनाएँ :
तुम हमारे हो
चुम्बन
प्राप्ति
हिन्दी साहित्य के समुद्र की अंतहीन गहराइयों से चुनी कुछ मधुर रचनाएँ
(२१ फरवरी १८९७ - १५ अक्तूबर १९६१)
श्यामनन्दन किशोर जी की कविता सागर पर प्रेषित हुई रचनाएँ :
(७ मार्च १९११ - ४ अप्रैल १९८७)
(२६ मार्च १९०७ - १२ सितंबर १९८७)
(२९ मार्च १९१३ - २० फरवरी १९८५)
(५ अगस्त १९१५ - २००२)
(३० अगस्त १९०३ - ५ अक्तूबर १९८०)
(२७ नवंबर १९०७ - १८ जनवरी २००३)
Hi Munish,
This is maneesh Pandey from Kashi..
Mitra Aap ki Harivanshrai Bachchanji ki rachanayo ka sangrah bahut hi uttam hai.
ess utkrisht kary ke liye aap ko meri tarf se dher sari hardhik badhaiyan.
Aaap se ek anuroodh hai ki ess sangrah me bachchanji ki mahan rachana MADHUSALA ko bhi sangrahit karane kasth kare.
Dhanwad,
Aap ka Mitra,
Maneesh K Pandey
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है !
बहुत अच्छा कहा है बन्धु, ये कविता अपनी पहली पत्नि के वियोग मे लिखी थी बच्चन जी ने ...
मैंने बच्चन जी की बहुत कविताएँ नहीं पढ़ीं थीं, केवल 'मधुशाला' को छोडकर । परन्तु जब से खोजना आरम्भ किया है तो ऐसे-ऐसे मोती मिले हैं के चकित रह गया हूँ । जल्द ही उनकी और कईं कविताएँ आप कविता सागर पर पायेंगे
एक दम सही है। इसमें आज के जीवन के सार हैं।
आपको इतना अच्छा काम करने के लिये बधाई।
बहुत नहीं थे सिर्फ चार कौए थे काले
रचना बहुत अच्छी लगी | शब्दों का चुनाव बहुत प्रभावोत्पादक है |
अनुनाद
यह कविता भाई के काव्य संग्रह 'त्रिकाल संध्या' से है. आपातकाल के दौरान भवानी भाई ने रोज़ तीन कविताएं लिखने का प्रण लिया था . इन कविताओं को इस संकलन में संकलित किया गया है. यदि आप अपनी स्मृति पर थोड़ा-सा जोर डालें और थोड़ी सी कल्पनाशीलता का इस्तेमाल करें तो आप इस कविता में वर्णित चारों कौए उर्फ़ चारों हौवे भी आसानी से पहचान सकेंगे . एक निडर और सच्चे कवि की बेहतरीन कविता .
है यह पतझड़ की शाम, सखे !
यह व्यथा की रात का कैसा सबेरा है ?
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