शनिवार, अप्रैल 02, 2005

चाँदनी जी लो

शरद चाँदनी बरसी
अँजुरी भर कर पी लो

ऊँघ रहे हैं तारे
सिहरी सरसी
ओ प्रिय कुमुद ताकते
अनझिप क्षण में
तुम भी जी लो ।

सींच रही है ओस
हमारे गाने
घने कुहासे में
झिपते
चेहरे पहचाने

खम्भों पर बत्तियाँ
खड़ी हैं सीठी
ठिठक गये हैं मानों
पल-छिन
आने-जाने

उठी ललक
हिय उमगा
अनकहनी अलसानी
जगी लालसा मीठी,
खड़े रहो ढिंग
गहो हाथ
पाहुन मन-भाने,
ओ प्रिय रहो साथ
भर-भर कर अँजुरी पी लो

बरसी
शरद चाँदनी
मेरा अन्त:स्पन्दन
तुम भी क्षण-क्षण जी लो !

- अज्ञेय

5 टिप्पणियाँ:

12:53 am पर, Blogger Kalicharan ने कहा ...

bahut bhadiya kavitayen le kaar aate hain, kripya late rahe taki aapke pathak kavya raas paate rahen.

 
8:55 pm पर, Blogger Vijay Thakur ने कहा ...

सही कहा काली भैया। जारी रखें अपना ये पुनीत काम।

 
2:05 pm पर, Blogger Mahavir Sharma ने कहा ...

'कविता सागर' वास्तव में हिन्दी-काव्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिये एक बहुमूल्य संग्रहालय से कम नहीं ! स्वः श्री नरेन्द्र शर्मा जी की कविता ' आज के बिछड़े न जाने कब मिलेंगे ' भी इस कोष में सम्मलित हो तो असंगत न होगा।
महावीर

 
2:21 pm पर, Blogger Munish ने कहा ...

काली जी, विजय जी और महावीर जी,

प्रोत्साहन के लिये सादर धन्यवाद । क्षमा चाहता हूँ के कुछ पारिवारिक कठिनाईयों के चलते 'कविता सागर' पर नियमित रूप से नयी कविताएँ प्रस्तुत नहीं कर पा रहा हूँ । मेरी कोशिश रहेगी कि सप्ताह में कम से कम ३ या ४ रचनाएँ प्रेषित करूँ ।

महावीर जी आपके सुझाव के लिये धन्यवाद। अगर आप भविष्य में और कोई रचना 'कविता सागर' पर चाहते हैं तो अवश्य लिखें ।

 
10:35 am पर, Blogger ashu ने कहा ...

great kaviayen i m really like it

 

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