कविता सागर

हिन्दी साहित्य के समुद्र की अंतहीन गहराइयों से चुनी कुछ मधुर रचनाएँ

शनिवार, फ़रवरी 19, 2005

भगवतीचरण वर्मा

(३० अगस्त १९०३ - ५ अक्तूबर १९८०)

भगवतीचरण वर्मा जी की कविता सागर पर प्रेषित हुई रचनाएँ :

कुछ सुन लें, कुछ अपनी कह लें
आज शाम है बहुत उदास
तुम सुधि बन-बनकर बार-बार
तुम मृगनयनी
मैं कब से ढूँढ़ रहा हूँ
तुम अपनी हो, जग अपना है
देखो-सोचो-समझो
पतझड़ के पीले पत्तों ने
कल सहसा यह सन्देश मिला
संकोच-भार को सह न सका
बस इतना--अब चलना होगा
आज मानव का सुनहला प्रात है

मुनीश द्वारा 3:22 अपराह्न पर प्रेषित   0 टिप्पणियाँ  

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