शुक्रवार, फ़रवरी 18, 2005

चार कौए उर्फ चार हौए

बहुत नहीं थे सिर्फ चार कौए थे काले
उन्होंने यह तय किया कि सारे उड़ने वाले
उनके ढंग से उड़ें, रुकें, खायें और गायें
वे जिसको त्योहार कहें सब उसे मनायें ।

कभी-कभी जादू हो जाता है दुनिया में
दुनिया भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में
ये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गये
इनके नौकर चील, गरूड़ और बाज हो गये ।

हंस मोर चातक गौरैयें किस गिनती में
हाथ बांधकर खडे़ हो गए सब विनती में
हुक्म हुआ, चातक पंछी रट नहीं लगायें
पिऊ-पिऊ को छोड़ें कौए-कौए गायॆं ।

बीस तरह के काम दे दिए गौरैयों को
खाना-पीना मौज उड़ाना छुटभैयों को

कौओं की ऐसी बन आयी पांचों घी में
बड़े-बड़े मनसूबे आये उनके जी में
उड़ने तक के नियम बदल कर ऐसे ढाले
उड़ने वाले सिर्फ रह गये बैठे ठाले ।

आगे क्या कुछ हुआ सुनाना बहुत कठिन है
यह दिन कवि का नहीं चार कौओं का दिन है
उत्सुकता जग जाये तो मेरे घर आ जाना
लंबा किस्सा थोड़े में किस तरह सुनाना ।

- भवानीप्रसाद मिश्र

2 टिप्पणियाँ:

2:29 am पर, Blogger अनुनाद सिंह ने कहा ...

रचना बहुत अच्छी लगी | शब्दों का चुनाव बहुत प्रभावोत्पादक है |

अनुनाद

 
8:12 am पर, Anonymous प्रियंकर ने कहा ...

यह कविता भाई के काव्य संग्रह 'त्रिकाल संध्या' से है. आपातकाल के दौरान भवानी भाई ने रोज़ तीन कविताएं लिखने का प्रण लिया था . इन कविताओं को इस संकलन में संकलित किया गया है. यदि आप अपनी स्मृति पर थोड़ा-सा जोर डालें और थोड़ी सी कल्पनाशीलता का इस्तेमाल करें तो आप इस कविता में वर्णित चारों कौए उर्फ़ चारों हौवे भी आसानी से पहचान सकेंगे . एक निडर और सच्चे कवि की बेहतरीन कविता .

 

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