रविवार, अक्तूबर 10, 2004

चुम्बन

लहर रही शशिकिरण चूम निर्मल यमुनाजल,
चूम सरित की सलिल राशि खिल रहे कुमुद दल

कुमुदों के स्मिति-मन्द खुले वे अधर चूम कर,
बही वायु स्वछन्द, सकल पथ घूम घूम कर

है चूम रही इस रात को वही तुम्हारे मधु अधर
जिनमें हैं भाव भरे हु‌ए सकल-शोक-सन्तापहर !

- सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

3 टिप्पणियाँ:

6:46 am पर, Blogger samar ने कहा ...

SUNDAR, ATISUNDAR !!

 
6:46 am पर, Blogger samar ने कहा ...

SUNDAR, ATISUNDAR !!

 
6:46 am पर, Blogger samar ने कहा ...

SUNDAR, ATISUNDAR !!

 

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