बुधवार, नवंबर 15, 2006

आज मानव का सुनहला प्रात है

आज मानव का सुनहला प्रात है,
आज विस्मृत का मृदुल आघात है;
आज अलसित और मादकता-भरे,
सुखद सपनों से शिथिल यह गात है;

मानिनी हँसकर हृदय को खोल दो,
आज तो तुम प्यार से कुछ बोल दो ।

आज सौरभ में भरा उच्छ्‌वास है,
आज कम्पित-भ्रमित-सा बातास है;
आज शतदल पर मुदित सा झूलता,
कर रहा अठखेलियाँ हिमहास है;

लाज की सीमा प्रिये, तुम तोड दो
आज मिल लो, मान करना छोड दो ।

आज मधुकर कर रहा मधुपान है,
आज कलिका दे रही रसदान है;
आज बौरों पर विकल बौरी हुई,
कोकिला करती प्रणय का गान है;

यह हृदय की भेंट है, स्वीकार हो
आज यौवन का सुमुखि, अभिसार हो ।

आज नयनों में भरा उत्साह है,
आज उर में एक पुलकित चाह है;
आज श्चासों में उमड़कर बह रहा,
प्रेम का स्वच्छन्द मुक्त प्रवाह है;

डूब जायें देवि, हम-तुम एक हो
आज मनसिज का प्रथम अभिषेक हो ।

- भगवतीचरण वर्मा

7 टिप्पणियाँ:

10:09 पूर्वाह्न पर, Blogger राकेश खंडेलवाल ने कहा ...

कालजयी रचना पर कुछ भी लिखना हमें असंगत होगा
आप इसे सन्मुख लाने पर कोटि बधाई लें स्वीकारें.

 
7:47 पूर्वाह्न पर, Blogger Nishikant Tiwari ने कहा ...

very good sir i liked it very much

 
7:17 पूर्वाह्न पर, Blogger Nishikant Tiwari ने कहा ...

दिल की कलम से
नाम आसमान पर लिख देंगे कसम से
गिराएंगे मिलकर बिजलियाँ
लिख लेख कविता कहानियाँ
हिन्दी छा जाए ऐसे
दुनियावाले दबालें दाँतो तले उगलियाँ ।
NishikantWorld

 
5:17 पूर्वाह्न पर, Blogger Aditya ने कहा ...

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2:20 अपराह्न पर, Anonymous बेनामी ने कहा ...

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शुक्रवार, सितंबर 22, 2006

पर्वत-सी पीर

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

- दुष्यन्त कुमार

5 टिप्पणियाँ:

1:10 पूर्वाह्न पर, Anonymous संजय बेंगाणी ने कहा ...

अच्छी कविता हैं. क्रांति के सुर लग रहे हैं.

खुद से करो शुरू
यह किसने कहा की
कारवाँ बनना ही चाहिए.

 
5:37 पूर्वाह्न पर, Anonymous नितिन बागला ने कहा ...

इसी कविता की दो पंक्तियाँ और..

अब दस्तकों का दरवाज़ों पर होता नहीं असर,
हर हथेली ख़ून से तरबतर होनी चाहिए ॥

 
11:35 पूर्वाह्न पर, Anonymous बेनामी ने कहा ...

bahut khoob, yeh main apni 12 varshiya bitiya ke liye print kar ke le ja raha hun

 
1:21 पूर्वाह्न पर, Anonymous बेनामी ने कहा ...

laajawaab.

ramesh mittal

 
2:09 पूर्वाह्न पर, Anonymous Lovely Jaiswal Advocate ने कहा ...

Hamne Dekha Hai Tujh mein Hunar Hai magar Khud Ko Mita Dene Ki Kubat Bhi Honi Chahiye

 

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सोमवार, सितंबर 18, 2006

कहते हैं, तारे गाते हैं

कहते हैं, तारे गाते हैं ।

सन्नाटा वसुधा पर छाया,
नभ में हमने कान लगाया,
फिर भी अगणित कंठों का यह राग नहीं हम सुन पाते हैं ।
कहते हैं, तारे गाते हैं ।

स्वर्ग सुना करता यह गाना,
पृथ्वी ने तो बस यह जाना,
अगणित ओस-कणों में तारों के नीरव आँसू आते हैँ ।
कहते हैं, तारे गाते हैं ।

ऊपर देव, तले मानवगण,
नभ में दोनों गायन-रोदन,
राग सदा ऊपर को उठता, आँसू नीचे झर जाते हैं ।
कहते हैं, तारे गाते हैं ।

- हरिवंशराय बच्चन

7 टिप्पणियाँ:

1:24 अपराह्न पर, Blogger Manish ने कहा ...

अच्छी लगी बच्चन जी की ये कविता !

 
1:33 अपराह्न पर, Blogger SHUAIB ने कहा ...

ये भी बढिया है

 
12:39 अपराह्न पर, Anonymous राज गौरव.. ने कहा ...

बहुत बडिया है..
येह मेरी favt कविता है.. :)

 
2:24 अपराह्न पर, Blogger Manish Kumar ने कहा ...

कहते हैं, तारे गाते हैं ।

कितना कहा पर सुना नही , ये दोष तारों का नही
मानस ही हैं जो सुनते नही |

बहुत ख़ूब कही है बचन साहब ने

 
7:30 पूर्वाह्न पर, Anonymous बेनामी ने कहा ...

iss se khoobsoorat rachna ho hi nahi sakti... taaron ke geet per

 
12:26 अपराह्न पर, Anonymous बेनामी ने कहा ...

Wah !bahut bahut Achi hai

 
10:21 पूर्वाह्न पर, Blogger Nitish ने कहा ...

bahut acchi kavita

 

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दुष्यन्त कुमार

दुष्यन्त कुमार जी की कविता सागर पर प्रेषित हुई रचनाएँ :

मत कहो, आकाश में कुहरा घना है
बाढ़ की संभावनाएँ सामने हैं
अपाहिज व्यथा
पर्वत-सी पीर

रविवार, सितंबर 17, 2006

अपाहिज व्यथा

अपाहिज व्यथा को सहन कर रहा हूँ,
तुम्हारी कहन थी, कहन कर रहा हूँ ।

ये दरवाज़ा खोलो तो खुलता नहीं है,
इसे तोड़ने का जतन कर रहा हूँ ।

अँधेरे में कुछ ज़िंदगी होम कर दी,
उजाले में अब ये हवन कर रहा हूँ ।

वे संबंध अब तक बहस में टँगे हैं,
जिन्हें रात-दिन स्मरण कर रहा हूँ ।

तुम्हारी थकन ने मुझे तोड़ डाला,
तुम्हें क्या पता क्या सहन कर रहा हूँ ।

मैं अहसास तक भर गया हूँ लबालब,
तेरे आँसुओं को नमन कर रहा हूँ ।

समाआलोचको की दुआ है कि मैं फिर,
सही शाम से आचमन कर रहा हूँ ।

- दुष्यन्त कुमार

शनिवार, सितंबर 16, 2006

तुम तूफान समझ पाओगे ?

तुम तूफान समझ पाओगे ?

गीले बादल, पीले रजकण,
सूखे पत्ते, रूखे तृण घन
लेकर चलता करता 'हरहर'--इसका गान समझ पाओगे?
तुम तूफान समझ पाओगे ?

गंध-भरा यह मंद पवन था,
लहराता इससे मधुवन था,
सहसा इसका टूट गया जो स्वप्न महान, समझ पाओगे?
तुम तूफान समझ पाओगे ?

तोड़-मरोड़ विटप-लतिकाएँ,
नोच-खसोट कुसुम-कलिकाएँ,
जाता है अज्ञात दिशा को ! हटो विहंगम, उड़ जाओगे !
तुम तूफान समझ पाओगे ?

- हरिवंशराय बच्चन

बस इतना--अब चलना होगा

बस इतना--अब चलना होगा
फिर अपनी-अपनी राह हमें ।

कल ले आई थी खींच, आज
ले चली खींचकर चाह हमें
तुम जान न पाईं मुझे, और
तुम मेरे लिए पहेली थीं;
पर इसका दुख क्या? मिल न सकी
प्रिय जब अपनी ही थाह हमें ।

तुम मुझे भिखारी समझें थीं,
मैंने समझा अधिकार मुझे
तुम आत्म-समर्पण से सिहरीं,
था बना वही तो प्यार मुझे ।
तुम लोक-लाज की चेरी थीं,
मैं अपना ही दीवाना था
ले चलीं पराजय तुम हँसकर,
दे चलीं विजय का भार मुझे ।

सुख से वंचित कर गया सुमुखि,
वह अपना ही अभिमान तुम्हें
अभिशाप बन गया अपना ही
अपनी ममता का ज्ञान तुम्हें
तुम बुरा न मानो, सच कह दूँ,
तुम समझ न पाईं जीवन को
जन-रव के स्वर में भूल गया
अपने प्राणों का गान तुम्हें ।

था प्रेम किया हमने-तुमने
इतना कर लेना याद प्रिये,
बस फिर कर देना वहीं क्षमा
यह पल-भर का उन्माद प्रिये।
फिर मिलना होगा या कि नहीं
हँसकर तो दे लो आज विदा
तुम जहाँ रहो, आबाद रहो,
यह मेरा आशीर्वाद प्रिये ।

- भगवतीचरण वर्मा

मंगलवार, सितंबर 12, 2006

मैं प्रिय पहचानी नहीं

पथ देख बिता दी रैन
मैं प्रिय पहचानी नहीं !

तम ने धोया नभ-पंथ
सुवासित हिमजल से;
सूने आँगन में दीप
जला दिये झिल-मिल से;
आ प्रात बुझा गया कौन
अपरिचित, जानी नहीं !
मैं प्रिय पहचानी नहीं !

धर कनक-थाल में मेघ
सुनहला पाटल सा,
कर बालारूण का कलश
विहग-रव मंगल सा,
आया प्रिय-पथ से प्रात-
सुनायी कहानी नहीं !
मैं प्रिय पहचानी नहीं !

नव इन्द्रधनुष सा चीर
महावर अंजन ले,
अलि-गुंजित मीलित पंकज-
-नूपुर रूनझुन ले,
फिर आयी मनाने साँझ
मैं बेसुध मानी नहीं !
मैं प्रिय पहचानी नहीं !

इन श्वासों का इतिहास
आँकते युग बीते;
रोमों में भर भर पुलक
लौटते पल रीते;
यह ढुलक रही है याद
नयन से पानी नहीं !
मैं प्रिय पहचानी नहीं !

अलि कुहरा सा नभ विश्व
मिटे बुद्‌बुद्‌‌‍-जल सा;
यह दुख का राज्य अनन्त
रहेगा निश्चल सा;
हूँ प्रिय की अमर सुहागिनि
पथ की निशानी नहीं !
मैं प्रिय पहचानी नहीं !

- महादेवी वर्मा

मंगलवार, जनवरी 31, 2006

बाढ़ की संभावनाएँ सामने हैं

बाढ़ की संभावनाएँ सामने हैं,
और नदियों के किनारे घर बने हैं ।

चीड़-वन में आँधियों की बात मत कर,
इन दरख्तों के बहुत नाज़ुक तने हैं ।

इस तरह टूटे हुए चेहरे नहीं हैं,
जिस तरह टूटे हुए ये आइने हैं ।

आपके क़ालीन देखेंगे किसी दिन,
इस समय तो पाँव कीचड़ में सने हैं ।

जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में,
हम नहीं हैं आदमी, हम झुनझुने हैं ।

अब तड़पती-सी ग़ज़ल कोई सुनाए,
हमसफ़र ऊँघे हुए हैं, अनमने हैं ।

- दुष्यन्त कुमार

8 टिप्पणियाँ:

4:42 पूर्वाह्न पर, Blogger दीपक ने कहा ...

munish ji, aapne sachmuch bahut hi achchha kaam kiya hai, kavita sagar ke liye dheron badhai. hindi me net par jitna kaam ho raha hai, use aur badhane ki jarurat hai. main aapse kai baaten janna chahta tha. mera id hai: deepakmodi2001@gmail.com
aapse samkark karna chahunga

 
8:15 पूर्वाह्न पर, Anonymous स्वाति ने कहा ...

मुनीश जी, कविता सागर के लिये बहुत बहुत धन्यवाद और हार्दिक शुभकामनाएँ।

 
1:39 अपराह्न पर, Anonymous बेनामी ने कहा ...

नमस्ते कुमार साहब। आपकी प्यारी कवीता पढ कर अच्छा लगा।

 
10:06 पूर्वाह्न पर, Anonymous बेनामी ने कहा ...

plese mujhe kavitayen apne id pe padne ka process batayen.

 
10:07 पूर्वाह्न पर, Blogger Bhaskar_Gupta ने कहा ...

plese main apne id pe kavitayen padh saku iska process batayen

 
4:29 पूर्वाह्न पर, Anonymous mohita ने कहा ...

hi munish ji!
kavitaaye bahut acche hain. mein bhi likhti hoon par procedure nahin pata hain .kya aap mughe help kar sakte ?????
mohita@live.in

 
2:36 पूर्वाह्न पर, Blogger BRAHMASTRA ABHIVYAKTI KA ने कहा ...

apka sankalan lazwab hai.dushyant kumar ki sabhi rachnaaen behatrin hain aur saamyik hain kintu un sabhi men se ek sabse samyik rachana aapane khoja hai kyonki is samay bihar men badh aai hui hai,yah aapne khoj isme sampadkiy kaushal jhalaktaa hai.

 
8:45 पूर्वाह्न पर, Blogger Suman ने कहा ...

nice

 

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