सोमवार, सितंबर 18, 2006

कहते हैं, तारे गाते हैं

कहते हैं, तारे गाते हैं ।

सन्नाटा वसुधा पर छाया,
नभ में हमने कान लगाया,
फिर भी अगणित कंठों का यह राग नहीं हम सुन पाते हैं ।
कहते हैं, तारे गाते हैं ।

स्वर्ग सुना करता यह गाना,
पृथ्वी ने तो बस यह जाना,
अगणित ओस-कणों में तारों के नीरव आँसू आते हैँ ।
कहते हैं, तारे गाते हैं ।

ऊपर देव, तले मानवगण,
नभ में दोनों गायन-रोदन,
राग सदा ऊपर को उठता, आँसू नीचे झर जाते हैं ।
कहते हैं, तारे गाते हैं ।

- हरिवंशराय बच्चन

6 टिप्पणियाँ:

1:24 अपराह्न पर, Blogger Manish ने कहा ...

अच्छी लगी बच्चन जी की ये कविता !

 
1:33 अपराह्न पर, Blogger SHUAIB ने कहा ...

ये भी बढिया है

 
12:39 अपराह्न पर, Anonymous राज गौरव.. ने कहा ...

बहुत बडिया है..
येह मेरी favt कविता है.. :)

 
2:24 अपराह्न पर, Blogger Manish Kumar ने कहा ...

कहते हैं, तारे गाते हैं ।

कितना कहा पर सुना नही , ये दोष तारों का नही
मानस ही हैं जो सुनते नही |

बहुत ख़ूब कही है बचन साहब ने

 
7:30 पूर्वाह्न पर, Anonymous बेनामी ने कहा ...

iss se khoobsoorat rachna ho hi nahi sakti... taaron ke geet per

 
12:26 अपराह्न पर, Anonymous बेनामी ने कहा ...

Wah !bahut bahut Achi hai

 

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