शनिवार, नवंबर 12, 2005

अजनबी देश है यह

अजनबी देश है यह, जी यहाँ घबराता है
कोई आता है यहाँ पर न कोई जाता है

जागिए तो यहाँ मिलती नहीं आहट कोई,
नींद में जैसे कोई लौट-लौट जाता है

होश अपने का भी रहता नहीं मुझे जिस वक्त
द्वार मेरा कोई उस वक्त खटखटाता है

शोर उठता है कहीं दूर क़ाफिलों का-सा
कोई सहमी हुई आवाज़ में बुलाता है

देखिए तो वही बहकी हुई हवाएँ हैं,
फिर वही रात है, फिर-फिर वही सन्नाटा है

हम कहीं और चले जाते हैं अपनी धुन में
रास्ता है कि कहीं और चला जाता है

दिल को नासेह की ज़रूरत है न चारागर की
आप ही रोता है औ आप ही समझाता है ।

- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

4 टिप्पणियाँ:

4:19 pm पर, Anonymous Saurabh Garg ने कहा ...

Very nice poem! Interesting blog, too. I am glad I can now read good poetry on the web!

 
5:51 pm पर, Anonymous बेनामी ने कहा ...

Its a really good poem . Touched my heart .Lookk forward to reading more poems like this on your blog

 
3:14 pm पर, Blogger Vinit ने कहा ...

Thanks for this kavita sir. Its so nice and close to heart, that I hardly need to read it back. It settled deep in heart and mind. Thanks. God Bless You.

 
3:16 pm पर, Blogger Vinit ने कहा ...

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