शुक्रवार, नवंबर 04, 2005

जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी (२)

तुम मनाते हो जिसे कहकर दिवाली
यह नहीं कोई प्रथा नूतन निराली
आज भी जग में अमा की रात काली
स्नेह से नव मृत्तिका के पात्र खाली

अधर सूखे, गाल पिचके, दीन कोटरलीन आँखें
शलभ बेसुध छटपटाते क्लिन्न मन विछिन्न पाँखें
मुर्दनी वातावरण में धुएँ की घूर्णित घुटन-सी
दर-ब-दर फैली हुई, बदबू विकट शव के सड़न-सी
उग रहीं कीटाणु की फसलें
प्रलय-अणुबम बरसता
खो गयी मानव-हृदय की सब सरसता
और जीने के लिए जीवन तरसता

युगों पहले एक दिन यों ही अँधेरा हो गया था
सूर्य, शनि, तारे छिपे सहसा, सवेरा खो गया था
एक काला हाथ ऊषा की ललाई धो गया था
गरज यह, जो कुछ न होना चाहिए वह हो गया था

दौर नव कृषि सभ्यता का राम बन कर रम रहा था
कारवाँ यायावरों का बस रहा था, जम रहा था
झोंपड़ों में ज्योति जीवन का प्रदीप जला गयी थी
धरा की बेटी मनुज की ब्याहता बन आ गयी थी

कि जिसके जनक ने धरती स्वयं जोती, स्वयं बोयी
कि हल की नोक में लक्ष्मी उलझ उभरी, रही खोयी

ज़माना बाहुबल का था, स्वयंवर का बहाना था
जिसे पाना पिनाकी के धनुष पर ज्या चढ़ाना था
धनुष जो झिल न सकता था, धनुष जो हिल न सकता था
बिना अच्युत हुए जिसका निशाना मिल न सकता था

धनुष को राम ने तोड़ा घने घनश्याम ने तोड़ा
नया निर्माण करना था पुराना तो पुराना था

हुई आश्वस्त भयभीता
खिली धरती, मिली सीता
कि दिशि-दिशि दुंदुभी दमकी
वही जीता, वही जीता
किया जिसने अहल्या-सी शिला
को प्रीति-परिणीता

धरा की आत्मजा कर में लिए वरमाल चलती थी
कि स्वर्णिम दीप की चल लौ अँधेरे में बिछलती थी
त्रियामा में किसी घनश्याम की छाती मचलती थी

गड़ा धन पा गया मानव कि खेती लहलहाती थी
कि गेहूँ गहगहाता था, कि मक्का महमहाती थी
कि अरहर सरसराती थी, कि बजरा हरहराता था
कि अलसी आँख मलती थी, कि जौ में ज्वार आता था

नयन में स्वप्न ढलते थे, हृदय में प्यार आता था
फसल उठती जवानी में लहरती झूम जाती थी
हवा दो हाथ आगे बढ़ उसे झुककर उठाती थी
लिपटते ही खुदी ख़ुद बेख़ुदी को चूम जाती थी

हृदय से हृदय मिलते थे, अधर से अधर मिलते थे
नयी कोंपल निकलती थी, हँसी के फूल खिलते थे
निकट जब आग आती थी तो लज्जा भाग जाती थी

गरज या दीपमाला सी जला करती थी धरती पर
नये अंकुर किलकते शुष्क बंजर, ख़ुश्क परती पर
मरुस्थल लहलहाता था कि चाहा चहचहाता था
अँधेरी रात में कोई खड़ा खेतों की मेड़ों पर
विकल विरहा सुनाता था

फड़कते होंठ, सूखे तालुओं से
फिर तरी की माँग उठती थी
अचानक दिल धड़कता था
निशा भी जाग उठती थी

न फिर सोने का लेती नाम थी
जो धुर सवेरे तक
कई संसार बनते ओ' बिगड़ते थे
अँधेरे से उजेले तक

सहम-सी साँस जाती थी
शिथिल अंचल उठाती थी
उनींदी रात आँखों में नये सपने बसाती थी

उभरती साँस छाती में
कि चोली कसमसाती थी
कहीं से धान की बाली
खड़ी चुप-चुप बुलाती थी

चढ़ी स्वर की लहर में
भावना सी दौड़ जाती थी
रवानी खून की बढ़ कर
समुन्दर को सुखाती थी

हवा में पेंग भरती थी
हिमालय को गलाती थी,
स्वयं मिटकर नयी हस्ती
नयी हस्ती बनाती थी

कि नव-निर्माण की बेला
विधाता को लजाती थी
बदलते दीप थे पर
स्नेह लौ को खो न पाता था

कि ब्रह्मानन्द का आनन्द
बासी हो न पाता था
क्षितिज से मेघ फटते थे
उषा भी खिलखिलाती थी
नये पत्तों पँखुरियों पर
नये मोती ढलाती थी

कि दिन में दीप जलते थे
कि तन में दीप जलते थे
कि मन में दीप जलते थे
निशा में दीप जलते थे
दिशा में दीप जलते थे

कि दीपों का नया त्यौहार घर-घर जगमगाता था
छलकता स्नेह पग-पग पर नयी धुन गुनगुनाता था
पवन नद नदी निर्झर में रवानी ही रवानी थी
कलि-अलि तरू-लता सब में जवानी ही जवानी थी

नये ज्योतिष्क पिण्डों से तमस की कुछ न चलती थी
कहत या महामारी की न कुछ भी दाल गलती थी
विषमता दैन्य करूणा भूख सिर धुन-धुन के रोती थी
जगाजग ज्योति से उनके हृदय में जलन होती थी

कि जो जग को रूलाने के लिए रावण बुला लायीं
अधमतम क्रूरकर्मा ध्वंस का धावन बुला लायीं
हरी खेती भरी बस्ती में जल-प्लावन बुला लायीं

कि जिसने भव-विभवमय स्वर्ण की लंका बनायी थी
हजारों घर उजाड़े थे दीवाली खुद मनायी थी
चमकते स्वर्ण-कलशों में गरीबों की कमायी थी

कुबेर ओ' इन्द्र जिसके द्वार पै दरबानी करते थे
पवन पंखा झला करता था पानी मेघ भरते थे
स्वयं यमराज चौखट से बँधे सब जुल्म सहते थे
विलासी देवगण को जिस तरह रखता था रहते थे

प्रकृति की शक्तियाँ जिसकी सलामी निज बजाती थीं
हज़ारों तारिकाएँ दीपमालाएँ सजाती थीं
करोड़ों शव के अम्बारों पै सिंहासन बनाया था
धरा की नन्दिनी को बन्दिनी जिसने बनाया था

दहलकर दम्भ से जिसको सभी दशशीश कहते थे
प्रबल आतंक से दो बाहुओं को बीस कहते थे
हवाओं की हवा उड़ती समुन्दर थरथराता था
जिसे लखकर खड़ी खेती को पाला मार जाता था

ककहरा ज़ुल्म का बच्चों को बचपन से सिखाता था
कि वेदों और शास्त्रों की सदा होली जलाता था
मनन करते हुए मुनियों की खालें खींच लेता था
घरौंदे खेलते बच्चों की टाँगें चीर देता था

पिताओं की सहेजी थातियों को छीन लेता था
किसानों के घरों के शेष दाने बीन लेता था
श्रमिक की रक्तमज्जा से रँगी जिसकी हवेली थी
धरा ने बड़े धीरज से दमन की धमक झेली थी

- शिवमंगल सिंह सुमन

1 टिप्पणियाँ:

6:16 am पर, Blogger Rishi Bhatt ने कहा ...

कि‍सी एक कवि‍ता पर नहीं मेरी टि‍प्‍पणी आपके पूरे ब्‍लाग के लि‍ये है। इस ब्‍लाग को शुरू करके आप हि‍न्‍दी कवि‍ता प्रेमि‍यों का कि‍तना कल्‍याण कर रहे हैं इसे व्‍यक्‍त नहीं कि‍या जा सकता।

यह प्रयास अनुकरणीय है, 10 से 5 की नौकरी में हम रोजी रोटी का जुगाड् करते हैं, इसके पहले या बाद हमारी रचनात्‍मकता ऐसे ही कि‍सी रचनात्‍मक कार्य में व्‍यक्‍त होती है।

 

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