बुधवार, अक्तूबर 19, 2005

फसल

हल की तरह
कुदाल की तरह
या खुरपी की तरह
पकड़ भी लूँ कलम तो
फिर भी फसल काटने
मिलेगी नहीं हम को ।

हम तो ज़मीन ही तैयार कर पायेंगे
क्रांतिबीज बोने कुछ बिरले ही आयेंगे
हरा-भरा वही करेंगें मेरे श्रम को
सिलसिला मिलेगा आगे मेरे क्रम को ।

कल जो भी फसल उगेगी, लहलहाएगी
मेरे ना रहने पर भी
हवा से इठलाएगी
तब मेरी आत्मा सुनहरी धूप बन बरसेगी
जिन्होने बीज बोए थे
उन्हीं के चरण परसेगी
काटेंगे उसे जो फिर वो ही उसे बोएंगे
हम तो कहीं धरती के नीचे दबे सोयेंगे ।

- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

1 टिप्पणियाँ:

5:31 pm पर, Blogger Radioaroma ने कहा ...

मुनीश ,सर्वेश्वर दयाल जी की लिखी प्रेरणादायक पंक्तियों के लिये धन्यवाद। इस कविता ने कहीं से, सुमित्रानंदन पंत जी कविता 'आ: धरती कितना देती है ' की याद भी दिलवायी है।

 

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