शुक्रवार, सितंबर 22, 2006

पर्वत-सी पीर

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

- दुष्यन्त कुमार

5 टिप्पणियाँ:

1:10 पूर्वाह्न पर, Anonymous संजय बेंगाणी ने कहा ...

अच्छी कविता हैं. क्रांति के सुर लग रहे हैं.

खुद से करो शुरू
यह किसने कहा की
कारवाँ बनना ही चाहिए.

 
5:37 पूर्वाह्न पर, Anonymous नितिन बागला ने कहा ...

इसी कविता की दो पंक्तियाँ और..

अब दस्तकों का दरवाज़ों पर होता नहीं असर,
हर हथेली ख़ून से तरबतर होनी चाहिए ॥

 
11:35 पूर्वाह्न पर, Anonymous बेनामी ने कहा ...

bahut khoob, yeh main apni 12 varshiya bitiya ke liye print kar ke le ja raha hun

 
1:21 पूर्वाह्न पर, Anonymous बेनामी ने कहा ...

laajawaab.

ramesh mittal

 
2:09 पूर्वाह्न पर, Anonymous Lovely Jaiswal Advocate ने कहा ...

Hamne Dekha Hai Tujh mein Hunar Hai magar Khud Ko Mita Dene Ki Kubat Bhi Honi Chahiye

 

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