शनिवार, फ़रवरी 19, 2005

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है !

हो जाय न पथ में रात कहीं,
मंज़िल भी तो है दूर नहीं
यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है !
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है !

बच्चे प्रत्याशा में होंगे,
नीड़ों से झाँक रहे होंगॆ
यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है !
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है !

मुझसे मिलने को कौन विकल ?
मैं होऊँ किसके हित चंचल ?
यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है !
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है !

- हरिवंशराय बच्चन

4 टिप्पणियाँ:

8:24 pm पर, Blogger Siddharth ने कहा ...

बहुत अच्‍छा कहा है बन्‍धु, ये कविता अपनी पहली पत्‍नि के वियोग मे लिखी थी बच्‍चन जी ने ...

 
10:05 pm पर, Blogger Munish ने कहा ...

मैंने बच्चन जी की बहुत कविताएँ नहीं पढ़ीं थीं, केवल 'मधुशाला' को छोडकर । परन्तु जब से खोजना आरम्भ किया है तो ऐसे-ऐसे मोती मिले हैं के चकित रह गया हूँ । जल्द ही उनकी और कईं कविताएँ आप कविता सागर पर पायेंगे

 
8:29 am पर, Blogger आशीष ने कहा ...

एक दम सही है। इसमें आज के जीवन के सार हैं।

आपको इतना अच्छा काम करने के लिये बधाई।

 
11:48 am पर, Blogger tbsingh ने कहा ...

a nice poem

 

टिप्पणी करें

<< मुखपृष्ट