रविवार, जुलाई 25, 2004

अन्तरंग

ये तिरस्कार, ये पुरस्कार
दोनों ही माता के दुलार ।

दोनों मिलते हैं अकस्मात
दोनों लाते हैं अश्रुपात
दोनों में साँसों का चढ़ाव
दोनों में साँसों का उतार ।

ये तिरस्कार मरू की ज्वाला
जो रचती मेघ-खण्ड-माला
ये तिरस्कार तीव्रानुभूति
रचती ज्वलन्त साहित्यकार ।

ये पुरस्कार कण्टकाकीर्ण
साधना बनाते ज़रा-जीर्ण
दो चार बढ़ाते आलोचक
दो चार बनाते समाचार ।

ये तिरस्कार ये पुरस्कार
दोनों ही माता की पुकार
दोनों में झंकृत होता है
माँ की वीणा का तार-तार ।

- श्यामनन्दन किशोर