रविवार, जून 20, 2004

मैं मधुर भी, तिक्त भी हूँ

मैं मधुर भी, तिक्त भी हूँ ।

थपकियों से आज झंझा
के भले ही दीप मेरा
बुझ रहा है, और पथ में,
जा रहा छाये अँधेरा ।

पर न है परवाह कुछ भी,
और कुछ भी ग़म नहीं है
ज्योति दीपक को, तिमिर को,
पथ की पहचान दी है ।

मैं लुटा सर्वस्व-संचित
पूर्ण भी हूँ, रिक्त भी हूँ
मैं मधुर भी, तिक्त भी हूँ ।।

अग्नि-कण को फूँक कर,
ज्वाला बुझाई जा रही है
अश्रु दे दॄग में, जलन,
उर की मिटाई जा रही है ।

इस सुलभ वरदान को मैं,
क्यों नहीं अभिशाप समझूँ ?
मैं न क्यों इस सजल घन से,
है बरसता ताप समझूँ ?
मैं मरूँ क्या, मैं जिऊँ क्या,
शुष्क भी हूँ, सिक्त भी हूँ
मैं मधुर भी, तिक्त भी हूँ ।।

मैं तुम्हारे प्राण के यदि,
अंक में तो क्या हुआ रे ?
है मनोरम कमल बसता
पंक में तो क्या हुआ रे ?
मैं तुम्हारे जाल में पड़
बद्ध भी हूँ, मुक्त भी हूँ
मैं मधुर भी, तिक्त भी हूँ ।।

- श्यामनन्दन किशोर

2 टिप्पणियाँ:

7:45 pm पर, Blogger Vinay ने कहा ...

मुनीश:

सबसे पहले तो साधुवाद और बधाई यह ब्लॉग शुरू करने के लिये। मैं इसके नियमित दर्शकों में से हूँ। आशा है आप भी नियमित रहेंगे। :)

और अब, आदत से मजबूर :), कुछ तुच्छ से वर्तनी शुद्धिकरण सुझाव:

पथ की पहचान दी है > पंथ ?
में मधुर भी, तिक्त भी हूँ ।। > मैं
मैं तुम्हारे जाल में पड > पड़

शुभ..

विनय
hindi.blogspot.com

 
10:05 am पर, Blogger Munish ने कहा ...

आपके सुझावों के लिये धन्यवाद विनय ।

>> पथ की पहचान दी है > पंथ ?
जहाँ तक याद पड़ता है, कवि ने 'पथ' ही प्रयोग किया है 'पंथ' नहीं । परन्तु मैं अवश्य ही यह सुनिश्चित करने का प्रयत्न करूँगा ।

>>में मधुर भी, तिक्त भी हूँ ।। > मैं
>>मैं तुम्हारे जाल में पड > पड़

यह दोनो मेरी गलतियाँ हैं जिन्हे मैं शीघ्रतम संशोधित करूँगा |

 

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