मंगलवार, जून 08, 2004

ज़िन्दगी

मित्रों,

जीवन एवं उसके अर्थ पर अनगिनत रचनाएँ लिखी गयी हैं । सो मैं भी आपके समक्ष अपनी एक तुच्छ रचना प्रस्तुत कर रहा हूं ।

ज़िन्दगी क्यों अजब इक पहेली सी है
क्षण में अंजान ,क्षण में सहेली सी है ।

है उल्लास थोडा, भय भी कुछ है मिला
काँपती नव-वधू की हथेली सी है ।

कोहरे मे रात के, भोर की ये किरण
तप्त मरु में जो खिलती चमेली सी है ।

नगर की धुंध में, स्वप्न बन रह गयी
गाँव की उस पुरानी हवेली सी है ।

मत्त श्रॄंगार में, प्रौढ से बेखबर
नार इतरा के चलती नवेली सी है ।

नीम की शाख के रस में लिपटी हुई
खट्टी ईमली, कभी गुड की भेली सी है ।

सूखे हैं पात सारे, रंग सबके उडे
लगती क्यों 'मन' को फिर भी रंगोली सी है ।

- मुनीश

5 टिप्पणियाँ:

12:01 am पर, Blogger मनीष अग्रवाल ने कहा ...

wonder full!

 
7:32 pm पर, Anonymous बेनामी ने कहा ...

It touched to the bottom of my Heart.
Georgeous!
Pankaj UPADHYAY from AUSTRALIA

 
10:13 pm पर, Anonymous लोकनाथ ने कहा ...

आपकी तुच्छ कविता कहीं अधिक ही ऊंची जान पड़ती है। बहुत ही सुंदर संरचना है।

 
5:52 pm पर, Blogger Munish ने कहा ...

प्रोत्साहन के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद।

 
3:15 am पर, Anonymous Asha kumar kundra ने कहा ...

Man ko chone wali kavita
Jindagi jitani jee tapovan see hai
Jindagi jitana chahege anmol see hai
Jindagi jitana sochage paheli see hai
Asha kumar kundra

 

टिप्पणी करें

<< मुखपृष्ट