शनिवार, अप्रैल 16, 2005

सब कुछ कह लेने के बाद

सब कुछ कह लेने के बाद
कुछ ऐसा है जो रह जाता है,
तुम उसको मत वाणी देना ।

वह छाया है मेरे पावन विश्वासों की,
वह पूँजी है मेरे गूँगे अभ्यासों की,
वह सारी रचना का क्रम है,
वह जीवन का संचित श्रम है,
बस उतना ही मैं हूँ,
बस उतना ही मेरा आश्रय है,
तुम उसको मत वाणी देना ।

वह पीड़ा है जो हमको, तुमको, सबको अपनाती है,
सच्चाई है-अनजानों का भी हाथ पकड़ चलना सिखलाती है,
वह यति है-हर गति को नया जन्म देती है,
आस्था है-रेती में भी नौका खेती है,
वह टूटे मन का सामर्थ है,
वह भटकी आत्मा का अर्थ है,
तुम उसको मत वाणी देना ।

वह मुझसे या मेरे युग से भी ऊपर है,
वह भावी मानव की थाती है, भू पर है,
बर्बरता में भी देवत्व की कड़ी है वह,
इसीलिए ध्वंस और नाश से बड़ी है वह,

अन्तराल है वह-नया सूर्य उगा लेती है,
नये लोक, नयी सृष्टि, नये स्वप्न देती है,
वह मेरी कृति है
पर मैं उसकी अनुकृति हूँ,
तुम उसको मत वाणी देना ।

- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

2 टिप्पणियाँ:

10:04 pm पर, Anonymous बेनामी ने कहा ...

I enjoy reading Sarveshvar Dayal Saxena's poems. Its delightful to read classic 'hindi kavitayen 'on kavita sagar.
'Anekanek Dhaynawaad'
Khushboo

 
8:07 pm पर, Blogger Vinit ने कहा ...

Its something which deeply touches your heart. I just read because of the title, but after reading I realized that the sayings are so touchable. probably because its stated in such a way that each of the reader identifes him/her self in it. Just awesome!

 

टिप्पणी करें

<< मुखपृष्ट