tag:blogger.com,1999:blog-7203744.post-1163646354977193652006-11-15T22:02:00.000-05:002006-11-15T22:05:56.113-05:00आज मानव का सुनहला प्रात हैआज मानव का सुनहला प्रात है,<br />आज विस्मृत का मृदुल आघात है;<br />आज अलसित और मादकता-भरे,<br />सुखद सपनों से शिथिल यह गात है;<br /><br />मानिनी हँसकर हृदय को खोल दो,<br />आज तो तुम प्यार से कुछ बोल दो ।<br /><br />आज सौरभ में भरा उच्छ्‌वास है,<br />आज कम्पित-भ्रमित-सा बातास है;<br />आज शतदल पर मुदित सा झूलता,<br />कर रहा अठखेलियाँ हिमहास है;<br /><br />लाज की सीमा प्रिये, तुम तोड दो<br />आज मिल लो, मान करना छोड दो ।<br /><br />आज मधुकर कर रहा मधुपान है,<br />आज कलिका दे रही रसदान है;<br />आज बौरों पर विकल बौरी हुई,<br />कोकिला करती प्रणय का गान है;<br /><br />यह हृदय की भेंट है, स्वीकार हो<br />आज यौवन का सुमुखि, अभिसार हो ।<br /><br />आज नयनों में भरा उत्साह है,<br />आज उर में एक पुलकित चाह है;<br />आज श्चासों में उमड़कर बह रहा,<br />प्रेम का स्वच्छन्द मुक्त प्रवाह है;<br /><br />डूब जायें देवि, हम-तुम एक हो<br />आज मनसिज का प्रथम अभिषेक हो ।<br /><br />- <a href="http://hindipoetry.blogspot.com/2005/02/blog-post_110884496271574280.html">भगवतीचरण वर्मा </a>Munishhttp://www.blogger.com/profile/01237020444765003132noreply@blogger.com