tag:blogger.com,1999:blog-7203744.post-1158519632870632422006-09-22T09:00:00.000-04:002006-09-22T09:03:53.643-04:00पर्वत-सी पीरहो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,<br />इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।<br /><br />आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,<br />शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।<br /><br />हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,<br />हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।<br /><br />सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,<br />सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।<br /><br />मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,<br />हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।<br /><br />- <a href="http://hindipoetry.blogspot.com/2006/09/blog-post_18.html">दुष्यन्त कुमार</a>Munishhttp://www.blogger.com/profile/01237020444765003132noreply@blogger.com