tag:blogger.com,1999:blog-7203744.post-1158518020616744332006-09-17T14:32:00.000-04:002006-09-18T22:56:25.893-04:00अपाहिज व्यथाअपाहिज व्यथा को सहन कर रहा हूँ,<br />तुम्हारी कहन थी, कहन कर रहा हूँ ।<br /><br />ये दरवाज़ा खोलो तो खुलता नहीं है,<br />इसे तोड़ने का जतन कर रहा हूँ ।<br /><br />अँधेरे में कुछ ज़िंदगी होम कर दी,<br />उजाले में अब ये हवन कर रहा हूँ ।<br /><br />वे संबंध अब तक बहस में टँगे हैं,<br />जिन्हें रात-दिन स्मरण कर रहा हूँ ।<br /><br />तुम्हारी थकन ने मुझे तोड़ डाला,<br />तुम्हें क्या पता क्या सहन कर रहा हूँ ।<br /><br />मैं अहसास तक भर गया हूँ लबालब,<br />तेरे आँसुओं को नमन कर रहा हूँ ।<br /><br />समाआलोचको की दुआ है कि मैं फिर,<br />सही शाम से आचमन कर रहा हूँ ।<br /><br />- <a href="http://hindipoetry.blogspot.com/2006/09/blog-post_18.html">दुष्यन्त कुमार</a>Munishhttp://www.blogger.com/profile/01237020444765003132noreply@blogger.com