tag:blogger.com,1999:blog-7203744.post-1158451655856834932006-09-16T20:06:00.000-04:002006-09-16T20:07:36.206-04:00बस इतना--अब चलना होगाबस इतना--अब चलना होगा<br />फिर अपनी-अपनी राह हमें ।<br /><br />कल ले आई थी खींच, आज<br />ले चली खींचकर चाह हमें<br />तुम जान न पाईं मुझे, और<br />तुम मेरे लिए पहेली थीं;<br />पर इसका दुख क्या? मिल न सकी<br />प्रिय जब अपनी ही थाह हमें ।<br /><br />तुम मुझे भिखारी समझें थीं,<br />मैंने समझा अधिकार मुझे<br />तुम आत्म-समर्पण से सिहरीं,<br />था बना वही तो प्यार मुझे ।<br />तुम लोक-लाज की चेरी थीं,<br />मैं अपना ही दीवाना था<br />ले चलीं पराजय तुम हँसकर,<br />दे चलीं विजय का भार मुझे ।<br /><br />सुख से वंचित कर गया सुमुखि,<br />वह अपना ही अभिमान तुम्हें<br />अभिशाप बन गया अपना ही<br />अपनी ममता का ज्ञान तुम्हें<br />तुम बुरा न मानो, सच कह दूँ,<br />तुम समझ न पाईं जीवन को<br />जन-रव के स्वर में भूल गया<br />अपने प्राणों का गान तुम्हें ।<br /><br />था प्रेम किया हमने-तुमने<br />इतना कर लेना याद प्रिये,<br />बस फिर कर देना वहीं क्षमा<br />यह पल-भर का उन्माद प्रिये।<br />फिर मिलना होगा या कि नहीं<br />हँसकर तो दे लो आज विदा<br />तुम जहाँ रहो, आबाद रहो,<br />यह मेरा आशीर्वाद प्रिये ।<br /><br />- <a href="http://hindipoetry.blogspot.com/2005/02/blog-post_110884496271574280.html">भगवतीचरण वर्मा</a>Munishhttp://www.blogger.com/profile/01237020444765003132noreply@blogger.com