tag:blogger.com,1999:blog-7203744.post-1131113324029321872005-11-04T09:08:00.000-05:002005-11-04T09:08:44.220-05:00जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी (३)घिरी लंका के चारों ओर गहरा गूढ़ खाई थी<br />इन्हीं गड्ढों से महलों की गगनभेदी ऊँचाई थी<br />हज़ारों अस्मतों को लूटकर वह खिलखिलाता था<br />स्वयं सूरज तमस से तुप गया था, तिलमिलाता था<br /><br />सभी भूखे थे नंगे थे, तबाही ही तबाही थी<br />मगर अन्याय का प्रतिरोध करने की मनाही थी<br />किसी ने न्याय माँगा तो समझ लो उसकी आफ़त थी<br />न जीने की इजाज़त थी न मरने की इजाज़त थी<br /><br />धरा को क़ैद कर आराम से वह रह न सकता था<br />मनुज इस क्रूर शोषण को बहुत दिन सह न सकता था<br />स्वयं अन्याय ने पीड़ित दलित को ला जुटाया था<br />प्रवासी राम ने विद्रोह का बीड़ा उठाया था<br /><br />नये संघर्ष की यह शक्ति धरती ने जगायी थी<br />किसी अवधेश या मिथिलेश की सेना न आयी थी<br />सुबह से शाम तक जो राक्षसी अन्याय सहते थे<br />जिन्हें सब जंगली हैवान बन्दर भालु कहते थे<br /><br />नयी जनशक्ति की हर साँस से हुंकार उठती थी<br />प्रबल गतिरोध के विध्वंस की धधकार उठती थी<br />कि बर्बर राक्षसों का जंगली वीरों से पाला था<br />महीधर फाँद डाले थे समुन्दर बाँध डाला था<br /><br />उधर थी संगठित सेना अनेकों यन्त्र दुर्धर थे<br />इधर हुंकारते हाथों में केवल पेड़-पत्थर थे<br />मगर था एक ही आदर्श जीने का जिलाने का<br />विगत जर्जर व्यवस्था को स्वयं मिटकर मिटाने का<br /><br />नयी थी कामना, नवभावना, संदेश नूतन था<br />नयी थी प्रेरणा, नव कल्पना, परिवेश नूतन था<br />नया था मोल जीवन का विषमता ध्वंस करने का<br />नया था कौल मानव का, धरा को मुक्त करने का<br /><br />चली क्या राम की सेना कि धरती बोल उठती थी<br />अखंडित शक्ति का भण्डार अपना खोल उठती थी<br />धरा की लाड़ली की जब अभय आशीष पायी थी<br />किसी हनुमान ने तब स्वर्ण की लंका जलायी थी<br /><br />कँगूरे स्वर्ण-सौधों के धरा लुंठित दिखाते थे<br />नुकीले अस्त्र दुश्मन के निरे कुंठित दिखाते थे<br />अमन का शंख बजता था दमन की दाह होती थी<br />मनुज की दानवों को आज खुल करके चुनौती थी<br /><br />विजय का बिगुल बजता था, अनय का नाश होता था<br />अँधेरा साँस गिनता था, सबेरा पास होता था<br />सिसकती रात के अंचल में रजनीचर बिलखते थे<br />उभरती उषा की गोदी में नव अंकुर किलकते थे<br /><br />घड़ी अन्तिम समझ दनुकुल जले शोले गिराता था<br />प्रबल जनबल उन्हें फिर मोड़ उन पर ही फिराता था<br />नयी गंगा विषमता के कगारों को ढहाती थी<br />नयी धारा, नयी लहरें उसे समतल बनाती थी<br /><br />युगों की साधना-सी राम ने जब शक्ति छोड़ी थी<br />किसी जर्जर व्यवस्था की विकट चट्टान तोड़ी थी<br />कटे सिर-सा पड़ा रावण धरा पर छटपटाता था<br />विगत युग मर्सिया गाता, नया युग गान गाता था<br /><br />बहुत दिन बाद दलितों की हँसी की आज पारी थी<br />कि फिर से मुक्त था मानव कि फिर से मुक्त नारी थी<br />बँधी मुट्ठी दिखा जन-टोलियाँ जय-गान गाती थीं<br />कि नव निर्माण के जंगल में भी मंगल मनाती थी<br /><br />धरा की लाड़ली प्रिय से लिपटने को ललकती थी<br />नयी कोंपल के होठों से, नयी कलिका किलकती थी<br />चपल चपला-सी आँखों में नयी आभा झलकती थी<br />सुधा के युगकटोरों से मदिर छलकन छलकती थी<br /><br />सबेरे का भटकता शाम को घर लौट आया था<br />नयी उन्मुक्त जनता ने नया उत्सव मनाया था<br />छिनी धरती मिली फिर से नये सपने सँजोए थे<br />सभी ने खेत जोते थे सभी ने बीज बोए थे<br /><br />घिरा काली घटाएँ थीं अमा की रात काली थी<br />मगर मानव-धरा के सम्मिलन की बात ही ऐसी निराली थी<br /><br />अयोध्या में नये युग को बुलाने की बेहाली थी<br />कि जिसके साज स्वागत में सजी पहली दिवाली थी<br />धरा की लाड़ली ने स्वयं जिसकी ज्योति बाली थी<br />विकल सूखे हुए अधरों में नव मुस्कान ढाली थी<br /><br />कि अस्त-व्यस्त तारों में नयी स्वर तान ढाली थी<br />धरा में स्वर्ग से बढ़कर सरसता थी, खुशहाली थी<br />वही पहला जनोत्सव था वही पहली दिवाली थी<br /><br />लहलहाती जब धरा थी, शस्य-श्यामल<br />गुनगुनाती जब गिरा थी गीत कल-कल<br />छलछलाते स्नेह से जब पात्र छ्लछल<br />झलमलाते जब प्रभा के पर्व पल-पल<br /><br />आज तुम दुहरा रहे हो प्रथा केवल<br />आज घर-घर में नहीं है स्नेह सम्बल<br />आज जन-जन में नहीं है ज्योति का बल<br />आज सूखी वर्त्तिका का सुलगता गुल<br />दीप बुझते जा रहे हैं विवश ढुल-ढुल<br /><br />शेष खण्डहर में विगत युग की निशानी<br />सुन रहे हो स्वपन में जैसे कहानी<br />बन गई हो जिस तरह अपनी बिरानी<br /><br />किंतु जन-जागृति धधकती जा रही है<br />जल उठेगी फिर नयी बाती सुहानी<br />जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी<br /><br />- <a href="http://hindipoetry.blogspot.com/2005/02/blog-post_110884530638308877.html">शिवमंगल सिंह सुमन</a><br /><br /><a href="http://static.flickr.com/29/54366413_58b12ef116_o.png" title="Image of this post"><img src="http://static.flickr.com/26/54330484_0d7054981f_o.png" style="border-style: none;" height="16" width="15" /></a>Munishhttp://www.blogger.com/profile/01237020444765003132noreply@blogger.com