tag:blogger.com,1999:blog-7203744.post-1130688330073508522005-10-30T10:49:00.000-05:002005-11-02T13:27:09.263-05:00जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी (१)दीप, जिनमें स्नेहकन ढाले गए हैं<br />वर्तिकाएँ बट बिसुध बाले गए हैं<br />वे नहीं जो आँचलों में छिप सिसकते<br />प्रलय के तूफ़ान में पाले गए हैं<br /><br />एक दिन निष्ठुर प्रलय को दे चुनौती<br />हँसी धरती मोतियों के बीज बोती<br />सिंधु हाहाकार करता भूधरों का गर्व हरता<br />चेतना का शव चपेटे, सृष्टि धाड़ें मार रोती<br /><br />एक अंकुर फूटकर बोला कि मैं हारा नहीं हूँ<br />एक उल्का-पिण्ड हूँ, तारा नहीं हूँ<br />मृत्यु पर जीवन-विजय उदघोष करता<br />मैं अमर ललकार हूँ, चारा नहीं हूँ<br /><br />लाल कोंपल से गयी भर गोद धरती की<br />कि लौ थी जगमगाई,<br />लाल दीपों की प्रगति-परम्परा थी मुस्कराई,<br />गीत, सोहर, लोरियाँ जो भी कहो तुम<br />गोद कलियों से भरे लोनी-लता झुक झूम गायी<br />और उस दिन ही किसी मनु ने अमा की चीर छाती<br />मानवी के स्नेह में बाती डुबायी<br />जो जली ऐसी कि बुझने की बुझायी-<br />बुझ गयी, शरमा गयी, नत थरथरायी<br /><br />और जीवन की बही धारा जलाती दीप सस्वर<br />आग-पानी पर जली-मचली पिघलने लगे पत्थर<br /><br />जल उठे घर, जल उठे वन<br />जल उठे तन, जल उठे मन<br />जल उठा अम्बर सनातन<br />जल उठा अंबुधि मगन-मन<br />और उस दिन चल पड़े थे साथ उन्चासों प्रभंजन<br />और उस दिन घिर बरसते साथ उन्चासों प्रलय-घन<br /><br />अंधड़ों में वेग भरते वज्र बरबस टूट पड़ते<br />धकधकाते धूमकेतों की बिखर जाती चिनगियाँ<br />रौद्र घन की गड़गड़ाहट कड़कड़ाती थी बिजलियाँ<br /><br />और शिशु लौ को कहीं साया न था, सम्बल नहीं था<br />घर न थे, छप्पर न थे, अंचल नहीं था<br />हर तरफ़ तूफ़ान अन्धड़ के बगूले<br />सृष्टि नंगी थी अभी बल्कल नहीं था<br /><br />सनसनाता जब प्रभंजन लौ ध्वजा-सी फरफराती<br />घनघनाते घन कि दुगुणित वेदना थी मुस्कराती<br />जब झपेटों से कभी झुक कर स्वयं के चरण छूती<br />एक लोच कमान की तारीकियों को चीर जाती<br /><br />बिजलियों से जो कभी झिपती नहीं थी<br />प्रबल उल्कापात से छिपती नहीं थी<br />दानवी तम से अकड़ती होड़ लेती<br />मानवी लौ थी कि जो बुझती नहीं थी<br />क्योंकि उसको शक्ति धरती से मिली थी<br />हर कली जिस हवा पानी में खिली थी<br /><br />सहनशीलता, मूकतम जिसकी अतल गहराइयों में<br />आह की गोड़ी निगोड़ी खाइयों में<br />स्नेह का सोता बहा करता निरंतर<br />बीज धँसता ही चला जाता जहाँ जड़ मूल बनकर<br />गोद में जिसके पला करता विधाता विवश बनकर<br /><br />धात्री है वह सृजन के पंथ से हटती नहीं है<br />व्यर्थ के शिकवे प्रलय-संहार के रटती नहीं है<br />जानती है वह कि मिट्टी तो कभी मिटती नहीं है<br />आग उसकी ही निरंतर हर हृदय में जल रही है<br /><br />स्वर्ण दीपों की सजीव परम्परा-सी चल रही है<br />हर अमा में, हर ग्रहन की ध्वंसपूर्ण विभीषिका में<br />एक कसकन, एक धड़कन, बार-बार मचल रही है<br />बर्फ की छाती पिघलकर गल रही है, ढल रही है<br /><br />आज भी तूफान आता सरसराता<br />आज भी ब्रह्माण्ड फटता थरथराता<br />आज भी भूचाल उठते, क़हर ढहता<br />आज भी ज्वालामुखी लावा उगलता<br /><br />एक क्षण लगता की जीत गया अँधेरा<br />एक क्षण लगता कि हार गया सवेरा<br />सूर्य, शशि, नक्षत्र, ग्रह-उपग्रह सभी को<br />ग्रस रहा विकराल तम का घोर घेरा<br /><br />किंतु चुंबक लौह में फिर पकड़ होती<br />दो दिलों में, धमनियों में रगड़ होती<br />वासना की रूई जर्जर बी़च में ही<br />उसी लौ की एक चिनगी पकड़ लेती<br /><br />और पौ फटती, छिटक जाता उजाला<br />लाल हो जाता क्षितिज का वदन काला<br />देखते सब, अंध कोटर, गहन गह्वर के तले पाताल की मोटी तहों को<br />एक नन्ही किरण की पैनी अनी ने छेद डाला,<br />मैं सुनाता हूँ तुम्हें जिसकी कहानी<br />बात उतनी ही नयी है, हो चुकी जितनी पुरानी<br />जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी<br /><br />- <a href="http://hindipoetry.blogspot.com/2005/02/blog-post_110884530638308877.html">शिवमंगल सिंह सुमन</a><br /><br /><a href="http://static.flickr.com/24/59038879_4236cb5b56_b.jpg" title="Image of this post"><img src="http://static.flickr.com/26/54330484_0d7054981f_o.png" style="border-style: none;" height="16" width="15" /></a>Munishhttp://www.blogger.com/profile/01237020444765003132noreply@blogger.com