tag:blogger.com,1999:blog-7203744.post-1130446372918486122005-10-27T16:48:00.000-04:002005-10-27T16:57:10.426-04:00मृत्तिका दीपमृत्तिका का दीप तब तक जलेगा अनिमेष<br />एक भी कण स्नेह का जब तक रहेगा शेष ।<br /><br />हाय जी भर देख लेने दो मुझे<br />मत आँख मीचो<br />और उकसाते रहो बाती<br />न अपने हाथ खींचो<br />प्रात जीवन का दिखा दो<br />फिर मुझे चाहे बुझा दो<br />यों अंधेरे में न छीनो-<br />हाय जीवन-ज्योति के कुछ क्षीण कण अवशेष ।<br /><br />तोड़ते हो क्यों भला<br />जर्जर रूई का जीर्ण धागा<br />भूल कर भी तो कभी<br />मैंने न कुछ वरदान माँगा<br />स्नेह की बूँदें चुवाओ<br />जी करे जितना जलाओ<br />हाथ उर पर धर बताओ<br />क्या मिलेगा देख मेरा धूम्र कालिख वेश ।<br /><br />शांति, शीतलता, अपरिचित<br />जलन में ही जन्म पाया<br />स्नेह आँचल के सहारे<br />ही तुम्हारे द्वार आया<br />और फिर भी मूक हो तुम<br />यदि यही तो फूँक दो तुम<br />फिर किसे निर्वाण का भय<br />जब अमर ही हो चुकेगा जलन का संदेश ।<br /><br />- <a href="http://hindipoetry.blogspot.com/2005/02/blog-post_110884530638308877.html">शिवमंगल सिंह सुमन</a><br /><br /><a href="http://static.flickr.com/27/56679182_9a2509a8cc_o.png" title="Image of this post"><img src="http://static.flickr.com/26/54330484_0d7054981f_o.png" style="border-style: none" width="15" height="16"/></a>Munishhttp://www.blogger.com/profile/01237020444765003132noreply@blogger.com