tag:blogger.com,1999:blog-7203744.post-1130423423110332282005-10-27T10:28:00.000-04:002005-10-27T10:36:20.663-04:00पर आँखें नहीं भरींकितनी बार तुम्हें देखा<br />पर आँखें नहीं भरीं।<br /><br />सीमित उर में चिर-असीम<br />सौंदर्य समा न सका<br />बीन-मुग्ध बेसुध-कुरंग<br />मन रोके नहीं रुका<br />यों तो कई बार पी-पीकर<br />जी भर गया छका<br />एक बूँद थी, किंतु,<br />कि जिसकी तृष्णा नहीं मरी।<br />कितनी बार तुम्हें देखा<br />पर आँखें नहीं भरीं।<br /><br />शब्द, रूप, रस, गंध तुम्हारी<br />कण-कण में बिखरी<br />मिलन साँझ की लाज सुनहरी<br />ऊषा बन निखरी,<br />हाय, गूँथने के ही क्रम में<br />कलिका खिली, झरी<br />भर-भर हारी, किंतु रह गई<br />रीती ही गगरी।<br />कितनी बार तुम्हें देखा<br />पर आँखें नहीं भरीं।<br /><br />- <a href="http://hindipoetry.blogspot.com/2005/02/blog-post_110884530638308877.html">शिवमंगल सिंह सुमन</a><br /><br /><a href="http://static.flickr.com/32/56584137_23de037a82_o.png" title="Image of this post"><img src="http://static.flickr.com/26/54330484_0d7054981f_o.png" style="border-style: none" width="15" height="16"/></a>Munishhttp://www.blogger.com/profile/01237020444765003132noreply@blogger.com